Sunday, March 27, 2011

न जाने मैं कहाँ था...

न जाने मैं कहाँ था...
 
बादलों के आँचल में 
इक शाम बड़ी सुहानी थी,
इक सुकून की छुअन थी,
हवा भी मस्तानी थी,
कब रंग गया रंग में
मस्ती में खोया था,
न खबर थी,
न चिंता थी खबर होने की.
निकल गया धुन में 
एक प्यारी सी तितली के संग,
झूमता डोलता बहता रहा,
मिटटी में सने पावों से
गिरता संभलता चलता रहा,
खिलखिलाती हंसी थी संग
खुला आसमाँ था,
धरती में महक में
अजब सा नशा घुला था,
हर शय खुश सा लगा, 
ये कोई और जहाँ था,
पंछियों की चहचहाट में
हल्की बूंदों से सजता समाँ था,
पर ये क्या
अचानक तितली उड़ चली दूर
मुझे खुद का न पता था,
एक छोटी सी, नन्ही सी जान लिए
न जाने मैं अब कहाँ था..
( Sometimes in life, some paths seem so attractive that they make you forget that you might be lost if you walk along them)
   

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