शनिवार, 23 जुलाई 2011

खुद को ही सजा देते हैं..


खुद को ही सजा देते हैं..

आँखों में नमी रखते हैं
सांसों को समझा देते हैं 
कोई मेरे लिए परेशां न हो
सोच हम मुस्करा देते हैं ..

हवा भी तड़प जाती है 
सांसों के जरिये दिल में आकर 
खुद में पल रहे गम को 
जो दिल में ही जला देते हैं ..

न राख बचती है
न धुआं उठता है 
न आह निकलती है 
न गिला होता है 
सब को खुद में ही दफना देते हैं
खुद को ही मीठी सजा देते हैं..


गुरुवार, 21 जुलाई 2011

तुझे मैं खुद में मिला लेता था..

तुझे मैं खुद में मिला लेता था..

आंसुओं को पलकों में छुपा लेता था
दर्द-ए-दिल यादों में दबा लेता था
जो पड़ते थे जख्म मुझमे तेरी यादों से
चुप रहता था, कुछ खून का कतरा बहा लेता था..

तनहा जीता था मैं महफ़िल में 
तेरे दर्द में खुद को जला लेता था
तेरे मोहल्ले से गुजरता था तुझे देखने को
खुद को चादर में छुपा लेता था..

सासों को रुकने की तमन्ना थी
सोने के लिए हर रोज दवा लेता था
वो बारिश ही था साथी मेरा
साथ उसके मैं अपने आंसू बहा लेता था..

मुहब्बत की आग आज भी जल रही मुझमे
कोशिश क़ी बुझाने की भी हमनें
हर बार जो आये हम सहारा लेकर
ये दिल है जो आग और बढ़ा लेता था..

मौत की जरूरत तो थी नहीं हमें
हर पल मौत सी ही सजा देता था..
तुझे भूलने की जितनी भी कोशिश करता  
तुझे और भी मैं खुद में ही मिला लेता था..

मंगलवार, 19 जुलाई 2011

कभी यहाँ इंसान रहे होंगे...

कभी यहाँ इंसान रहे होंगे...

इन ऊँची इमारतों की जगह
कभी छोटे खुश मकान रहे होंगे,
इन कारखानों ने जो ले ली हैं जमीनें
इनसे न जाने कितने जुड़े अरमान रहे होंगे,
सामने से आती थी कभी बच्चों के हँसने की आवाजें 
अब तो रोने की आवाजें हैं या मौत की शांति
सोचता हूँ कभी तो लोग नादान रहे होंगे,
अब जिन रास्तों में होती हैं मौत की बातें 
कभी ये रस्ते सुनसान रहे होंगे,
इन रोज की ख़बरों में बहता है दर्द बेहिसाब
कभी तो इन ख़बरों में ख़ुशी के पैगाम रहे होंगे,
मरता है आदमी जो हर पल हर जगह यहाँ 
कभी मरे लोगों के लिए अलग शमशान रहे होंगे,  
सोचता हूँ  आज तो जी रहे हैं हम बदनाम जिंदगी 
हमसे पहले कभी यहाँ इंसान रहे होंगे....

शुक्रवार, 1 जुलाई 2011

लोग कहते है...

लोग कहते है...


लोग कहते है तुम क्या जानो मुहब्बत की सजा,
किसी ने पूछा ही नहीं हमने कभी मुहब्बत की है या नहीं .

लोग कहते हैं कभी आंसू भी बहाया है किसी प्रिय की खातिर
किसी ने सोचा ही नहीं रैन मेरे भी आंसू से लिखे पन्नों में जलते थे कभी.

लोग कहते हैं तुम्हे क्या पता चाहकर किसी को खोना क्या होता है
किसी ने देखा की नहीं मेरी आँखों में आती नमी.

लोग कहते हैं किसी की आवाज़ सुनने तक को तरस जाता है मन
किसी ने सुनी ही नहीं मुझमे तेरी गूंजती हर हंसी.

लोग कहते है तुम क्या जानो मुहब्बत क्या है
सही कहते हैं वो की मेरी मुहब्बत में न मौत है न जिंदगी...


 

सोमवार, 20 जून 2011

सोचूं अब तुझको भुलाया जाये ..

सोचूं अब तुझको भुलाया जाये ..

बातों ही बातों में बात न बढाया जाये 
हर रोज सोचूं तुम्हे आज भुलाया जाये 
हर कोशिश कर ली मैंने अब तक
न जाने कैसे इस दिल को समझाया जाये 
काँच के ख़ाब टूटे और बिखर गए 
अब उम्मीदों के महल को गिराया जाये
की सोचूं अब तुम्हे भुलाया जाये ..

भटक चूका हूँ बहुत
न तू मिले न तेरा ठिकाना आये 
उलझनों में उलझा हूँ मैं 
की अब खुद को बाहर निकाला जाये
जिंदगी को कुछ संभाला जाये.. 

बस सोचता हूँ पर चाहता ही नहीं
की तू कभी कहीं मुझसे दूर जाये 
वो तो आंसू है मेरे, दर्द मेरे 
वरना कौन चाहे की खुद के पन्नों से
अपनी जिंदगी को मिटाया जाये ..
कौन चाहे तुझ सी परी को भुलाया जाये ..

शनिवार, 18 जून 2011

कुछ पंक्तियाँ..

कुछ पंक्तियाँ..



"गली में वीरानियों से मैं गुजर रहा था,
दिल चुपके चुपके तेरी बातें कर रहा था,
वो दिन याद आये वो सपने याद आये और 
जिंदगी कांच के खाबों को टुकड़ों में बदल रहा था."

" तू है तभी तो हूँ मैं दीवाना 
तेरी तरह कोई हसीं कहाँ है,
तेरी हँसी से है ये जिंदगी,
तेरे बिना जिंदगी कहाँ है."

"कुछ पथ्थरों से ताजमहल बनते हैं
कुछ आशिकों पे उठते हैं और गजल बनते हैं"

" अब जो तन्हाई से मुहब्बत की
तन्हाई भी सताने लगी
चुपके से तेरी मुहब्बत को
फिर से पास लाने लगी "

" कुछ रोज पहले तेरी यादों में मेरा आना जाना था
दरवाजे बंद करके तू कहता है कि मैं भूल गया तुझको."





गुरुवार, 5 मई 2011

मेरी KGP की जिंदगी..कुछ शब्दों में..

मेरी KGP की जिंदगी..कुछ शब्दों में..
 
कभी यहाँ आना था हमें
हमनें अपनी जान लगायी थी
मेहनत की, पसीना बहाया था
और मेहनत रंग लायी थी.   
खुदा से दुआ की हर पल
खुद की भूली परछाई थी
हमने लाखों की दौड़ में
अपनी जगह यहाँ बनायीं थी.

जो रूबरू हुए थे यहाँ से   
वो मिटटी की खुशबू
वो बारिश का पानी
वो शांत सुहानी शाम
वो लोगों की भीड़ 
वो अजीब सी हंसती ख़ुशी 
वो जज्बात, 
वो चमकते चेहरे  
अब भी याद आते हैं.

पहला साल
खुद में खोया था
न हंसा कभी
न कभी रोया था
क्लास का पता नहीं
पर जम कर सोया था
न ज़माने की खबर थी मुझे
न ज़माने को मेरी थी खबर
न ज्यादा दोस्ती यारी थी
न साथ कोई नारी थी
खुद में रहता था
खाता पीता सोता था
न जाने कैसे बीता पहला साल
बस ऐसा था हमारा हाल.

दूसरे साल में हालत ख़राब थी
मिला सबको senior हॉल
गया तो हो गयी रैगिंग शुरू
हम हुए चेले और वो थे गुरु
आलतू फालतू फंडे देते थे
अच्छे कम ज्यादा गंदे देते थे
रैगिंग खत्म हुआ 
फिर हुआ शुरु इल्लू
दिल भी कहने लगा तब तक
थोड़ी चैन की साँस ले लूँ
पर तुरत आया हॉल इलेक्शन
बढ़ गया फिर हमारा टेंशन
जैसे भी बीते वो उलझे दिन
पर वो पल अब भी याद आते हैं
हम सोचते हैं और अब भी मुस्कुराते हैं.

तीसरा साल सुरु हुआ
अब रैगिंग लेने का समय था
इंटर्नशिप लगवाने की दौड़ थी
पर पहली बार हम
खुले सांड की तरह घूमना सुरु किये
चेला का status हटा के गुरु किये
सोसाइटी, हॉल, डेप 
हर समय मस्त होता था
कभी कोई मेरा लेता था
कभी मैं किसी का लेता था
आखिर में हम अमरीका में इन्टर्न पर गए
घूमे फीरे, मजे किये और वापस आ गए.


चौथा साल बड़ा ही शांति भरा था
न GRE ,न GATE , न placement ,न CAT, न GMAT  देना था
सब को तैयारी करते देखना और मजे लेना था 
बस दिन भर बैठ के समय काटना था
मस्ती करनी थी, भाट मरना था
कॉलेज लाइफ की पूरी कसर निकल दी
मस्ती की हर जगह, मजा आ गया
कुछ किया तो सायद वो btp था.
और उसमे भी मैं छा गया.

अब अंतिम समय आया है
हमें यहाँ से जाना है
हमें लगाव नहीं यहाँ से
ये कहना तो बस
खुद को शांत करने का बहाना है
वही अजीब सी ख़ुशी में अब गम  है 
आँखें फिर से आज नम हैं
कैसे शुक्र अदा करें सबका
की हर पल अनमोल था मेरा
इनका असर देखेंगी आने वाली सदियाँ
इन पलों को सोच जब हम मुस्कुराएंगे
कभी कीमत लगनी होगी तो
हम खुद को लुटा जायेंगे
ये पल हम कभी न भूल पायंगे.   

( If you are reading this, tell me something about yours :) )