सोमवार, 4 अक्टूबर 2010

कैसे भूलूँ तुझे..



कैसे भूलूँ तुझे..


दिल पे चोट गहरा है,

धड़कन सहमा सा कह रहा है,

कैसे भूलूँ तुझे,

कभी खुद को तोड़ के तुझे खुद से जाने दूंगा,

भूलूँगा जब खुद को छोड़ के खुद को जाने दूंगा।



हर खून के कतरे में बसी तू,

तेरे बिना कोई वक़्त कहाँ है,

कैसे भूलूं तुझे,

कभी उस खून के कतरे को जो तुझसे जुड़ा है जाने दूंगा,

भूलूँगा तुझे जब खून का हर कतरा खुद से बह जाने दूंगा।



मेरी यादों में तेरा आशना है,

तेरे उस आसने में मेरी यादों का जहाँ है,

कैसे भूलूँ तुझे,

कभी कुछ हिस्सा मन से मिट जाने दूंगा,

भूलूँगा तुझे जब अपनी याद्दास्त मिटाने दूंगा।



मेरे हर बात की शुरुआत हो तुम,

जैसे मेरी आवाज़ हो तुम,

कैसे भूलूँ तुझे,

कभी कभी चुप रहकर तुझे पास न आने दूंगा,

भूलूँगा तुझे जब अपनी जुबां कट जाने दूंगा।



मेरे धड़कन में बसी हो तुम,

तू ही तो मेरी जां है,

कैसे भूलूं तुझे,

कभी धडकनें धीमी करके तेरे एहसास को न आने दूंगा,

भूलूँगा तुझे जब धड़कनों को रुक जाने दूंगा।



हर सांस की जिंदगी हो तुम,

तेरे बिना जीवन कहाँ है,

कैसे भूलूं तुझे,

कभी कुछ सासों को अन्दर न आने दूंगा,

भूलूँगा तुझे जब साँसों को जिंदगी से जाने दूंगा।



कैसे भूलूं तुझे,

बस कुछ छोटी कोशिशें कर सकता हूँ,

पर भूल के भी खुद से तुझको कैसे भुलाने दूंगा।

शनिवार, 2 अक्टूबर 2010

वो वक़्त अब भी जवां है...

वो वक़्त अब भी जवां है...

वो
मस्त हवा, फिक्र - मंद जिंदगानी,

वो मस्त मौसम, वो बारिश का पानी,

वो साथ तेरा हाँथों में हाँथ लिए,

वो मस्त आवारगी,मदमस्त जवानी।


वो दीदार तेरा, तेरी वो बातें,

वो दिन, साथ बीती वो रातें,

वो प्यार भरी नज़रें,

वो बिछड़ना और वो मुलाकातें।


वो तेरा मेरे सर को सहलाना,

वो तेरा हँसाना और रुलाना,

वो तेरा कभी रूठ जाना,

वो मेरा तुझको प्यार से मनाना।


वो तेरा गुस्सा, तेरी बचकाना हरकत,

वो कभी तेरी शान सौकत,

वो शर्मना वो सजना संवरना,

वो तेरी नवरस नजाकत।


वो तेरा मुझको चूमना,

वो तेरा मस्ती में झूमना,

वो कभी लहराना, कभी शांत,

वो तेरा हवाओं के संग घूमना।


वो तेरे लम्स, वो तेरा एहसास,

वो तेरे मुहब्बत की प्यास,

वो कभी तेरा मुझसे छिप जाना,

वो कभी तेरी तलाश।


वो वक़्त मुझे अब जिंदगी देता है,

वो वक़्त अब कहाँ है,

वक़्त कितना भी गुजरा हो,

तू साथ अब हो हो,
वो वक़्त अब भी जवां है।

शुक्रवार, 1 अक्टूबर 2010

..वो जमाना न रहा

..वो जमाना रहा


वो राज़ ओ नियाज़ , वो नाता न रहा,

वोह मुहब्बत का गुलिस्तां न रहा,

वो आवारगी, वो दीवानगी,

उस जूनून का अब पता न रहा.


अब तो रेगिस्तां में गुलिस्तां की जुस्तजू है,

अब वो मस्त समां न रहा,

तेरी खोज में अब भटक चुके है हम,

वो मस्त खिलखिलाता जहाँ न रहा.


वक़्त गुजर गए हैं बहुत,

अब तो मन उतना जवां न रहा,

अब तो सब तनहा है कहीं,

अब वो कारवां न रहा.


यादें तो पहले भी सताती थी,

पर कुछ आशाओं के संग जीता था मैं,

अब तो बस मरने की गुजारिश है,

जख्मों के लिए अब वो दवा न रहा.


अब टूट चूका हूँ मैं,

देख मेरी तरफ कभी,

तेरी जुल्मों का असर है ,

कि वो परवाना,वो परवांना न रहा,

जाने दो किसे क्या दोष दूँ मैं,

अब मजनुओं का जमाना न रहा.